रेलवे में निजीकरण का नया पैंतरा: जब कर्मचारी मौजूद तो ठेकेदार क्यों?

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न्यूज 21भारत लखनऊ

पूर्वोत्तर रेलवे के लखनऊ मंडल में इन दिनों एसी स्कॉटिंग को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। रेलवे के विद्युत विभाग में पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित कर्मचारी मौजूद होने के बावजूद, लंबी दूरी की गाड़ियों में एसी स्कॉटिंग और पावर कार के अनुरक्षण का कार्य निजी ठेकेदारों को सौंपे जाने की प्रक्रिया ने कर्मचारियों में गहरी नाराजगी भर दी है। यह नाराजगी अब आंदोलन का रूप लेती दिख रही है।

पूर्वोत्तर रेलवे कर्मचारी संघ के महामंत्री श्री विनोद राय को विद्युत विभाग के कई कर्मचारियों ने शिकायत की है कि विभाग के पास संसाधनों और जनशक्ति की कोई कमी नहीं है। इसके बावजूद लंबी दूरी की ट्रेनों में कार्यरत कर्मचारियों को नजरअंदाज कर निजी कंपनियों के हाथों में जिम्मेदारी दी जा रही है। इससे न केवल विभागीय कर्मचारियों के मनोबल पर असर पड़ रहा है, बल्कि रेलवे के वित्तीय संसाधनों पर भी अनावश्यक बोझ डाला जा रहा है।

विनोद राय ने बताया कि रेलवे जितना पैसा एक निजी ऑपरेटर को भुगतान कर रहा है, उतनी ही राशि में रेलवे के तीन प्रशिक्षित कर्मचारी कार्य कर सकते हैं। इसके बावजूद निजीकरण की यह प्रक्रिया यह संकेत देती है कि विभागीय निर्णय नीतिगत पारदर्शिता से कोसों दूर हैं। उन्होंने इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए महाप्रबंधक महोदया, पूर्वोत्तर रेलवे को एक पत्र के माध्यम से जानकारी दी है और अनुरोध किया है कि इस टेंडर प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाए।

रेलवे यूनियन के इस विरोध के पीछे कर्मचारियों का यह भी कहना है कि प्राइवेट ऑपरेटरों की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान पहले से ही लगे हुए हैं। ऐसे में जब विभाग के पास पर्याप्त संख्या में दक्ष कर्मचारी उपलब्ध हैं, तो फिर बाहरी एजेंसी पर निर्भरता क्यों?

लखनऊ मंडल के अधिकारियों द्वारा लिए गए इस मनमाने निर्णय से न केवल कर्मचारी असंतुष्ट हैं, बल्कि यह प्रशासनिक दृष्टिकोण की गंभीरता पर भी सवाल उठाता है। विनोद राय का कहना है कि यह मामला केवल नौकरी बचाने या प्राइवेट सेक्टर के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह रेलवे के संसाधनों और कर्मचारियों की गरिमा की रक्षा का प्रश्न है।

अब देखना यह होगा कि रेलवे प्रशासन इस पत्र को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या यह टेंडर वाकई निरस्त किया जाएगा या कर्मचारियों की यह आवाज भी बाकी विरोधों की तरह अनसुनी रह जाएगी।

लेकिन इतना तय है कि अगर समय रहते यह फैसला नहीं बदला गया, तो यह मुद्दा आगे चलकर एक बड़ा विवाद बन सकता है। जिसका असर न केवल विभागीय कार्यप्रणाली पर पड़ेगा, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा पर भी पड़ेगा।

अतुल वर्मा की रिपोर्ट

Adv Vinod Kumar
Author: Adv Vinod Kumar

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